झाँसी के इस क्रांतिकारी ने किशोरावस्था में थाने में घुसकर मारा था...

झाँसी के इस क्रांतिकारी ने किशोरावस्था में थाने में घुसकर मारा था अंग्रेज अफसर को थप्पड़, उन्हीं से जानिए कितने भयावाह थे गुलामी के वे दिन

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झाँसी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सत्यदेव तिवारी
 @श्रीलक्ष्मी
झाँसी. देश को आजाद कराने की लड़ाई में जिन लोगों ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था, आजादी के उन नायकों के के अंदाज भी निराले थे। एक ओर देश की आज़ादी की लड़ाई के मैदान में नामचीन क्रांतिकारी थे तो दूसरी ओर कई ऐसे भी लोग थे जो आज़ादी की लड़ाई में गुमनाम रहते हुए जिंदगी भर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले रहे।
झांसी के वयोवृध्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सत्यदेव तिवारी की भी कहानी एक ऐसे ही गुमनाम सिपाही की कहानी जैसी है।
पिता के साथ दो माह रहे थे जेल में –
जब उनकी उम्र केवल 12 साल की थी तब उन्होंने ब्रिटिश सरकार के थानेदार को थप्पड़ मार दिया था। थप्पड़ मारने का कारण था पिता का अपमान। दरअसल क्रांतिकारियों की मदद करने के शक में सत्यदेव तिवारी और उनके पिता को पुलिस थाने ले आई थी।
थाने में थानेदार ने सत्यदेव के पिता से गाली गलौज की तो किशोर सत्यदेव को यह गाली गलौज बर्दाश्त नहीं हुई और थानेदार को थप्पड़ जड़ दिया। इसके बाद उस किशोर उम्र में ही अंग्रेजों की पुलिस के हाथों भयानक रूप से पिटने के बाद उन्हें दो महीने पिता के साथ जेल में रहना पड़ा। इसके बाद उन्होंने भी पिता के रास्ते पर चलते हुए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की राह चुन ली।
दो मोर्चों लड़ी गयी थी अंग्रेजों से जंग 
देश को आज़ादी मिले बहत्तर साल का समय बीत चुका है। अपने दौर को याद करते हुए वे लड़ाई की दो धाराओं के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि एक संगठन कुर्बानी देने में यकीन करता था और दूसरा वर्ग बुद्धिजीवियों का था। यह वर्ग बैठकर आज़ादी हासिल करने के बौद्धिक तरीकों पर विचार करता था। क्रन्तिकारी अंग्रेजों से लड़ते थे और फांसी पर चढ़ जाते थे लेकिन उनका सीधा जनता से सम्पर्क नहीं था।
दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का संगठन था जो अपने तौर तरीकों से अंग्रेजों को प्रस्ताव देते थे। इसी दौर में अफ्रीका में गांधीजी का शांतिपूर्ण सफल आंदोलन हुआ जिसके बाद नीग्रो को नागरिकता का अधिकार मिला। उस आंदोलन के बाद जब गांधीजी भारत लौटे तो उन्होंने आज़ादी की लड़ाई को उसी अहिंसक तरीके से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
तीन पीढियां खप गईं आज़ादी की जंग में 
आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने की भूमिका भी बेहद दिलचस्प तरीके से बनी। उन्होंने बताया कि हमारे परिवार में तीन पीढ़ियों से लोग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे है। मेरे पिता के यहां क्रन्तिकारी आते थे और ठहरते थे। मोठ तहसील में फतेहपुर के निकट बेतवा के किनारे जंगल में क्रन्तिकारी जुटते थे और हथियार चलाना सीखते थे।
इसके बाद पिताजी चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़ गए। ओरछा में साधु वेश में आज़ाद रहते थे। वहां क्रन्तिकारी जुटते थे। मैं छोटा था। क्रन्तिकारी मुझे बहुत प्यार करते थे। वे मुझे पिस्तौल पकड़ा देते थे। कहते थे लगाओ निशाना। मेरी उम्र आठ-नौ साल की होगी। हम पिस्तौल पकड़ते थे और वे दबा देते थे। हम उछल पड़ते थे।
क्रांतिकारियों के लिए घर -घर जाकर इकठ्ठा करते थे खाना 
सत्यदेव तिवारी बताते हैं कि वे धीरे-धीरे वे क्रांतिकारियों की मीटिंगों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने लगा। क्रांतिकारियों की मीटिंग के लिए वे चादर लेकर घर-घर खाना इकठ्ठा करते थे और क्रांतिकारियों को उपलब्ध कराते थे। तिवारी झांसी के बावई गांव में रहते थे, जो समथर रियासत का हिस्सा था।
क्रांतिकारियों का सहयोग करने के लिए उनके पिताजी को नौ महीने के लिए रियासत से भी निष्कासित कर दिया गया। उस समय उनका परिवार अलग-अलग जगहों पर रहा।
सत्यदेव तिवारी आगे बताते हैं – ‘ पाण्डेचरी पर पुर्तगाल का कब्जा था। उस समय राम मनोहर लोहिया और मधु लिमये ने वहां आज़ादी का आंदोलन शुरू किया।
हम वहां भी गए। गोलियां चली। जांघ में गोली लगी। पिटाई से पीठ की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ।लम्बे समय तक इलाज चला। इसके बाद विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन से जुड़े।’
50 करोड़ लोगों ने दिया देश के लिए बलिदान
सत्यदेव तिवारी कहते हैं – ‘ क्रांतिकारियों ने यह सोचा नहीं था कि आज़ादी देखेंगे लेकिन यह यकीन था कि देश आज़ाद होगा। भारत में 40 करोड़ की आबादी में देश की आज़ादी में 50 हज़ार लोगों का बलिदान था। हर एक का योगदान नहीं रहा। लम्बी गुलामी के बाद सोचने की शक्ति खत्म हो गई थी। पूंजीपति, जमींदार और जुल्म करने वाले लोग जनसंघ में, कांग्रेस में, कम्युनिस्ट पार्टियों में शामिल हो गए।
 आज़ादी के बाद स्वार्थी हो गए लोग
शिक्षा व्यवस्था नकल आधारित हो गई। डिग्रियां बिकने लगीं। देश की बड़ी आबादी कमजोर होती गई। गुलामी में जो संस्कार हमने जीवित रखे थे, आज़ादी के बाद वे खत्म हो गए। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर अय्याशी और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए।  धर्म मनोरंजन का साधन बन गए। शिक्षा व्यापार का साधन बन गया। आजीविका के साधन और संपत्ति पूंजीपतियों के हाथ में चली गई।
राजनीति में भाई भतीजावाद और माफिया का प्रवेश दुखद
जनता के हाथ में तो कुछ रहा ही नहीं। अब एक बार फिर से क्रांति की जरूरत है। आज विकास और शिक्षा कुछ लोगों तक सीमित हो गयी है। शिक्षा और स्वास्थ्य प्रत्येक नागरिक को पूरी तरह मिलनी चाहिए। कोई सरकार यह दे नहीं पा रही। इससे देश का विकास रुका हुआ है। विधानसभा और लोकसभा में जूते उछाले जाते हैं। सारे राजनीतिक दलों में भ्रष्ट और माफिया लोग घुस गए हैं। कोई विभाग ऐसा नहीं हैं जिसमे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद न हो।’

 

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