सत्ता से स्वतंत्र को ‘ताकत’, संसाद भानु ‘कमजोर’, मंत्री चहेतों को टिकट मिलने से जालौन में अंतर्कलह

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फाइल फोटो - स्वतंत्र देव सिंह
@rakesh dwivedi-
उरई । नगर निकाय चुनाव के लिए टिकट वितरण अब बीजेपी के लिए नया सिरदर्द साबित हो रहा है. लोकल पॉलिटिक्स पर अपना बजूद कायम रखने को स्थानीय स्तर के सीनियर नेताओं से लेकर मंत्री और सांसद की सीधी दखलंदाजी देखने को मिली है. लोकल राजनीति में विपक्षी दलों को शिकस्त देने सत्ता का हथियार लेकर तैयार खड़ी भाजपा अपने ही घर में भिड़ती दिख रही है. जालौन की राजनीति में मंत्री स्वतंत्रदेव का कद इतना बढ़ गया की यहाँ के सांसद भानु प्रताप वर्मा अपने ही बेटे को टिकट नहीं दिला पाए. कई सीनियर नेताओं के स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के अरमान ठन्डे हो गए. तो वहीँ मंत्री स्वतंत्र देव अपने करीबियों को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए.   इसी को लेकर उरई में बीजेपी के खिलाफ बगावत के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं. यह घमासान अब और तेज होने लगा है.

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टिकटों पर खड़े हुए सवाल-
जिला जालौन मेँ इस वक्त भाजपा मेँ अफरा -तफरी का माहौल है । उरई नगर पालिका के टिकट को लेकर जातीय असंतोष तक फैलता जा रहा है । दूसरी नगर पालिका व नगर पंचायतों तक के प्रत्याशियों की सांसें अटकने लगी हैं । क्योंकि इस विवाद मेँ उनका राजनीतिक खेल बिगड़ता नजर आ रहा है । उरई सहित कुछ अन्य टिकटों को लेकर प्रश्न चिन्ह भी लगे हैं । इन निर्णयों के पीछे  संगठन से जुड़े लोगों का राजनीतिक अनुभव की कमी और कुछ अन्य तरह के लालच भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं ।
वैश्य समुदाय बीजेपी से नाराज 
जिले की भाजपा इस वक्त विद्रोही तेवरों  विकट दौर से गुजर रही है । 1977 से पार्टी की विचार धारा से जुड़कर काम कर रहे अनिल गहोई बहुगुणा का नाम भी पैनल मेँ न जाने से जब उनकी जगह दिलीप दुबे को टिकट दे दिया गया तो उनके साथ – साथ जिले का वैश्य समुदाय भी आग बबूला हो गया ।
मंत्री समेत इनको बताया अंतर्कलह का जिम्मेदार
इसके पीछे तीन लोगों को दोषी ठहराया जा रहा है । वह हैं – मंत्री स्वतंत्र देव सिंह , स्थानीय निकाय चुनाव प्रभारी  व जिला महा मंत्री  नीरज श्रीवास्तव और जिला अध्यक्ष उदयन पालीवाल । दिलीप दुबे काफी समय से स्वतंत्र देव सिंह के नजदीकी हैं । निकटता काफी स्नेहात्मक है । जिलाध्यक्ष को कोई प्रभावी निर्णय लेने की अपेक्षा पद की रखवाली करने का ज्यादा फिक्रमंद माना जाता है । बताते हैं कि इसका कई मौकों पर फायदा नीरज श्रीवास्तव उठा ले जाते हैं । इस चुनाव मेँ तो वार्ड स्तर तक से नाना प्रकार के स्वर गूंज रहे हैं । अनिल बहुगुणा ने तो खुले आम कहा है कि यदि उनका हक उनसे छीना गया है तो इसके पीछे सीधे  ऊपरी षड्यंत्र और स्थानीय लालच रहा है , इसीलिए पैनल मेँ नाम तक नही भेजा गया जब कि पूरी पार्टी उन्हे चुनाव लड़ाना चाहती थी । जिम्मेदार लोगों की तरफ से अभी तक इस संबंध मेँ कोई जवाब न आने से बहुगुणा के आरोप लोगों को सच से लग रहे हैं ।
पहले भी रही है स्वतंत्र देव और दुसरे गुटों में खेमेबंदी 
स्वतंत्र देव यहीं से ऊपर की ओर गए हैं । बाबूराम ने उन्हें कभी अपना नही माना था । तब स्वतंत्रदेव सिंह ने अपना नया रास्ता चुना । वह दादा के न चाहने के बावजूद आगे बढ़ते गए । इस तरक्की मेँ उनके कुछ विशेष गुण भी रहे । एक समय ऐसा भी आया जब बाबूराम तक उन्हें खुद से ज्यादा ताकतवर समझने लगे थे । 2007 मेँ जब  ऐन वक्त पर बाबूराम का टिकट कट गया तो इसके पीछे आम ने स्वतंत्र देव का ही हाथ माना गया था । तब बाबूराम ने  खुलकर उन्हें ही जिम्मेदार माना था । उनके समर्थकों ने तो मुर्दाबाद तक के नारे लगाए थे । उनके तमाम लोग विनोद चतुर्वेदी के साथ   चले गए थे । ताजा चुनाव मेँ बाबूराम गुट काफी कमजोर साबित हुआ है । इस गुट के कभी बेहद मजबूत रहे लोग भी अपने को दुर्बल पा रहे हैं । खुद सांसद बाबूराम की नही सुनी गई । कोंच से न तो उनके बेटे को टिकट मिला न ही उरई से वरिष्ठ नेता अवध शर्मा को महत्व दिया गया । खास बात तो ये है कि उरई के मामले मेँ विधायकों की राय को भी नही माना गया । उधर कोंच मेँ वार्ड 8 मेँ नई लड़ाई छिड़ गई है । उदयन पालीवाल ने विक्रम सिंह तोमर को  अधिकृत किया है तो नगर अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता ने जिला अध्यक्ष के निर्णय को न मानकर रवि दीक्षित को प्रत्याशी बना दिया है ।

 

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