दो मजदूरों की मौत के बाद अस्पताल में नहीं मिला कर्मचारी, परिजनों को स्ट्रेचर पर ढोनी पड़ी लाश

0

आशीष सागर-
बांदा। बुन्देलखण्ड के महोबा में एक खदान में ब्लास्टिंग के दौरान धसकी खदान में दो मजदूरों की दर्दनाक मौत होने के बाद उनकी पत्नी और बच्चे अनाथ हो गए। उपचार के लिए अस्पताल पहुंचे मजदूरों को मृत घोषित कर बाहर छोड़ दिया गया। परिसर से बाहर शव पहुंचाने के लिए कोई सरकारी कर्मचारी नहीं मिला तो मजदूर की मां और परिजनों  को ही लाश को ढोना पड़ गया। तस्वीर में मां लाश को स्ट्रेचर से खींचकर ले जा रही है और लोग तमाशबीन बने खड़े हैं। दर्द की ये दास्तां उस वक्त और बेरहम हो गई जब पीडि़त परिजनों ने अपनी गरीबी का दुखड़ा प्रशासनिक अफसर के सामने रोया और जवाब में अफसर ने कहा, मौत पर हमें अफसोस है, लेकिन इस पर सरकारी मदद की उम्मीद न रखें। क्योंकि मजदूर की दुर्घटना में मौत पर सरकार की तरफ से कोई प्रावधान नहीं है।
एक मजबूर परिवार के सवाल पर प्रशासनिक अफसर के जवाब ने देश के उस सच को सामने रख दिया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पैसा कमाने के लिए मजदूरी करने या पकौड़ा तलने का आइडिया तो देते हैं, लेकिन इस काम के दौरान यदि किसी की दुर्घटना में मौत हो जाए तो वह सरकार से मदद की गुजाइश कतई नहीं होगी। मुआवजा तो छोडि़ए यहां तो अस्पताल से शव को अस्पताल परिसर से बाहर पहुंचाने के लिए भी कर्मचारियों का इंतजाम नहीं है।

मामला महोबा का है जहां शुक्रवार को खदान में ब्लास्टिंग के दौरान दो मजदूरों की मौत हो गई। बतलाते चले मजदूर रस्सी के सहारे खदान में काम कर रहे थे। प्राथमिक मानक व चिकित्सा सुविधाओं से महरूम इन पहाड़ खदान में आये दिन श्रमिक का मर जाना सामान्य घटना है। काम करते वक्त टीला धस गया जिससे ये हादसा हुआ। लोगो ने मलबे में दबे प्रताप,सुनवा,कल्लू को बाहर निकाला। प्रताप की मौके पर,सुनवा की अस्पताल में मृत्यु हो गई। कल्लू को झांसी में उपचार के लिए भेजा गया है। जान हथेली पर रखकर पेट पालने को ये श्रमिक दो सौ फीट से अधिक गहरी खदानों में उतरकर स्टोन बोल्डर निकालते है। अवैध तरीके से हैवी ब्लास्टिंग के चलते ये ग्रेनाइट की खदान धंसती हैं। पूरे महोबा के अधिकांश गांव इन पहाड़ की खदानों ने खोखले कर दिए है। बानगी के लिए गौरहारी,गंज,जुझार,डहर्रा पत्थर मंडी देख लीजिए। पेशे में स्थानीय विधायक, नेताओं का सिंडिकेट काम करता है। मजदूरों की मौत पर विधायक -सांसद सब मौन हो गए हैं। वहीं मृतक मजदूरों के परिजनों का कहना है कि वह अब कैसे जिंदा रहेंगे। बच्चों को पालना पहले की मुश्किल था अब तो उनका संसाद ही उजड़ गया है।

LEAVE A REPLY