हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आए कभी तो मत रोना …

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अत्यंत गरीबी और अभाव में पले बढ़े बरूआसागर के रहने वाले इंदीवर ने कालजयी गीत लिखे। पांच दशकों बाद भी इंदीवर के गीत आज की युवा पीढ़ी की जुबान पर हैं। बुंदेली साहित्य व संस्कृति की पूरी दुनिया में लोहा मनवाने वाले इंदीवर को बुंदेलखंडखबर डाट्काम की विनम्र श्रद्धांजलि:
झांसी। श्यामलाल बाबू राय उर्फ इन्दीवर का जन्म 15 अगस्त, 1924 को झांसी के बरूआसागर कस्बे में हुआ था। निर्धन परिवार में जन्मे इंदीवर की बाल्यकाल में मां बाप की मौत हो गई। इनको बड़ी बहन और बहनोई ने पाला। शुरू से ही इंदीवर को गीत लिखने और गाने का शौक था। लेकिन, इन्हें कोई गुरू नहीं मिला। यह स्वंय ही गीत लिखने और गाने लगे। युवा अवस्था में बिना मर्जी के विवाह से ये अनमने रहने लगे और रुष्ट होकर लगभग बीस वर्ष की अवस्था में मुम्बई भागकर चले गए। यहां काफी संघर्ष किया, लेकिन असफल रहे। वापस आने पर इन्होंने कुछ माह अपनी धर्मपत्नी के साथ गुजारे।

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इन्दीवर ने चार दशकों में लगभग एक हजार गीत लिखे, जिनमें से कई यादगार गाने फिल्मों की सुपर-डुपर सफलता के कारण बने। कस्बे में एक फक्कड़ बाबा के सम्पर्क में आकर गीत लिखना और गाना शुरू किया। देश के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में सक्रिय भाग लेते हुए इन्होंने श्यामलाल बाबू आजाद नाम से कई देश भक्ति के गीत लिखे।

इंदीवर भारत के प्रसिद्ध गीतकारों में गिने जाते थे। इनके लिखे सदाबहार गीत आज भी जुबान पर याद हैं। 1975 में अमानुष फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। अपने सिने कैरियर में 300 से ज्यादा फिल्मों के लिये गीत लिखे।
इंदीवर के सदाबहार गीत
हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आए कभी तो मत रोना
बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम
कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं, बातों का क्या
दुल्हन चली वो पहन चली
कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिये
चंदन सा बदन
मैं तो भूल चली बाबुल का देश
नफरत करने वालों के सीने में
पल भर के लिये कोई हमें
मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनियां
जीवन से भरी तेरी आंखें
जो तुमको हो पसंद

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