सूखा में फसल कैसे बचाएं किसान, जानें कृषि वैज्ञानिकों की राय

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लखनऊ. चटकदार धूप खिलने से लगभग समूचे उत्तर प्रदेश में मौसम में आयी तब्दीली के बीच मौसम एवं कृषि वैज्ञानिकों ने फसल के बचाव के लिये किसानों को अहम सुझाव दिये हैं।  मौसम आधारित राज्य स्तरीय कृषि परामर्श समूह की बीसवीं बैठक में आंचलिक मौसम विज्ञान केन्द्र, लखनऊ, कृषि विश्वविद्यालय, कानपुर के मौसम, तिलहन एवं कीट वैज्ञानिक, कृषि विश्वविद्यालय, इलाहाबाद के पादप प्रजनन वैज्ञानिक, कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद के मौसम व दलहन वैज्ञानिक, कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, मत्स्य, वन विभाग, उद्यान विभाग एवं भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के मौसम तथा मृदा वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।
        मौसम पूर्वानुमान के अनुसार 12 सितंबर तक प्रदेश के सभी जिलों में हल्के से मध्यम बादल छाये रहने के आसार है। कुल मिलाकर इस सप्ताह दिन का अधिकतम तापक्रम 32-34 डिग्री सेंटींग्रेड एवं न्यूनतम तापक्रम 22-24 डिग्री सेंटीग्रेड रहने के आसार है जो सामान्य से 2-3 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक है। ऐसी स्थिति में वातावरण में नमी का प्रतिशत दोपहर के समय 45-55 प्रतिशत रहने के आसार हैं।
        वैज्ञानिकों ने कहा कि सूखे की स्थिति में खाद्यान फसलों में दो प्रतिशत यूरिया और पोटाश का छिड़काव करें। शुष्क वातावरण की स्थिति को देखते हुए खाद्यान्न, दलहनी एवं तिलहनी फसलों में ङ्क्षसचाई कर नमी बनाये रखें। धान मेें कल्ले, बाल निकलने व फूल खिलने की अवस्था नमी के प्रति संवेदनशील हैं। इसलिये इन अवस्थाओं में खेत में नमी अवश्य बनाये रखें।
        वैज्ञानिकों ने कहा कि जलभराव वाले क्षेत्रों में धान में यूरिया की टॉप ड्रेङ्क्षसग से पूर्व यूरिया की मात्रा की दोगुनी मिट्टी में एक चैथाई गोबर की खाद मिलाकर 24 घण्टे तक रखने के उपरान्त टॉप ड्रेङ्क्षसग करना चाहिये। ऐसा करने से यूरिया रिसाव द्वारा नष्ट कम होगी। वातावरण मे तापक्रम एवं नमी की अधिकता रहने से रोग एवं कीट प्रभावी होंगे। कीट नियंत्रण के लिये पर्यावरण हितैषी उपायों यथा प्रकाश-प्रपंच, बर्ड पर्चर, फेरोमोन ट्रैप, ट्राइकोगामा तथा रोग नियंत्रण के लिये ट्राइकोडरमा का प्रयोग करें। कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए कीटनाक रसायनों का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में करे।
        जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, वहॉ के सब्जी उत्पादकों को सलाह दी जाती है कि वे अल्प अवधि एवं कम पानी में भी अच्छी उपज प्राप्ति हेतु पालक, मूली, गाजर, शलजम, चुकन्दर, मेथी तथा धनिया आदि की खेती करें। सब्जी मटर तथा आलू के बीज की व्यवस्था सुनिश्चित करें ताकि पर्याप्त नमी की दशा में समय पर बुवाई कर सकें।
        उन्होंने बताया कि कल्ले फूटते समय व बाली बनते समय नत्रजन की चौथाई मात्रा यूरिया की टॉप ड्रेङ्क्षसग करें। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाय कि यूरिया की टॉप ड्रेङ्क्षसग करते समय खेत में पर्याप्त नमी उपलब्घ हो। धान में हरा, भूरा एवं सफेद पीठ वाला फुदका के नियन्त्रण के लिये एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस.पी. 100 ग्राम अथवा कार्बोफ्यूरान 3 जी. 20 किग्रा. (3-5 से.मी. स्थिर पानी में) अथवा मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. 750 मिली. प्रति हे. की दर से 500-600 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें।
        वैज्ञानिकों का कहना था कि यदि हिस्पा के दो प्रौढ़ कीट या दो ग्रसित पत्ती प्रति हिल दिखाई दे तो बाईफेन्थ्रिन 10 प्रतिशत ई.सी. 500 मि.ली./हे. अथवा क्यूनालफॉस 25 ईसी. 1.50 ली./हे. की दर 500-600 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें। जीवाणु झुलसा एवं जीवाणुधारी झुलसा के नियंत्रण हेतु 15 ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट 90 प्रतिशत़ 4 ग्राम टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत को 500 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी. के साथ मिलाकर 500-750 लीटर पानी में घोलकर प्रति हे. छिड़काव करें।
        धान में भूरा धब्बा एवं झोंका रोग की रोकथाम के लिये एडीफेनफॉस 50 प्रतिशत ई.सी. 500 मिली. अथवा मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.0 किग्रा. अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. 2.0 किग्रा. प्रति हे. 500-750 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। गंधी कीट बाली की दुग्धावस्था में लगता है। गंधी कीट 1-2 कीट प्रति पुंज दिखाई देने पर मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत धूल 20-25 किग्रा. अथवा मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल 20-25 किग्रा. अथवा फेनबैलरेट 0.04 प्रतिशत धूल 20-25 किग्रा. का प्रति हे. की दर से बुरकाव करें।
      वैज्ञानिकों ने बताया कि अरहर में पत्ती लपेटक का प्रकोप दिखाई देने पर डाईमेथोएट 30 ई.सी. एक लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. 750 मिली. प्रति हे. की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। उर्द एवं मूंग की पत्तियों पर सुनहरें चकत्ते पड़ गये हों या सम्पूर्ण पत्ती पीली पड़ गयी हो तो यह पीला चित्रवर्ण रोग (यलोमोजेक) है। यह रोग सफेद मक्खियों द्वारा फैलता है। ऐसे रोगग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़कर जमीन में गाड़ दें। सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए डाइमिथोएट 30 ई.सी. 01 लीटर या मिथाइल ओ-डिमेटान (25ई0सी0) 01 लीटर प्रति हे0 की दर से दो-तीन छिड़काव करें।
     मूॅगफली की पत्तियों पर हल्के भूरे रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं जो कि टिक्का रोग के लक्षण हैं। इसका उपचार करने के लिए मैंकोजेब (ङ्क्षजक मैंगनीज कार्बामेट) 02 किग्रा. या जिनेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2.5 किग्रा. जीरम 27 प्रतिशत तरल के 3 लीटर अथवा जीरम 80 प्रतिशत के 2 किग्रा0 के 2-3 छिड़काव 10 दिन के अन्तर पर करें।
       अगैती राई की खेती के लिये कान्ती एवं नरेन्द्रा राई अगैती-4 के बीज की व्यवस्था करें। सोयाबीन की फसल में पत्तियों को काटने वाले कीट, रस चूषक तथा गर्डल वीटिल का प्रकोप होने पर क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.5 लीटर अथवा इथियान 50 ई.सी. 1.5 लीटर 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
        गन्ना की खेती के लिये बेधक कीटों के जैविक नियंत्रण के लिये 50 हजार ट्राइकोग्रामा अंड युक्त ट्राइकोकार्ड प्रति हे. लगायें। कार्ड टुकडों में काटकर पंत्तियों की निचली सतह पर नत्थी कर दें। यह कार्य 10 दिनों के अंतराल पर दोहरायें। ट्राइकोकार्ड भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, रायबरेली रोड, लखनऊ से प्राप्त किये जा सकते हैं।

 

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