गंगा को गंदा करता संडास का पानी

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झांसी। उत्तर भारत के लिए गंगा जीवनदायिनी है। लेकिन, गंगा का पानी लगातार प्रदूषित होता जा रहा है। 1985 में बने गंगा एक्शन प्लान से अभी तक करीब आधा दर्जन से ज्यादा गंगा सफाई योजनाओं पर करीब 11,000 करोड़ रूपये खर्च किए जा चुके हैं, जबकि पूरी तरह से गंगा को साफ करने में 100 खरब रूपये खर्च होंगे।
पर्यावण संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था सीएसई की मानें गंगा के प्रदूषण का मुख्य कारण घरों से निकलने वाला संडास है। यानी शौचालयों के सेप्टिक टैंक का मलमूत्र युक्त पानी है। गंगा बेसिन में प्रतिदिन 73,010 लाख लीटर मलमूत्र युक्त पानी मिलता है, जबकि मात्र 21,250 लाख पानी की सफाई होती है। 2019 तक गंगा के किनारे बसे शहरों में 30 लाख से ज्यादा शौचालय एवं सेप्टिक टैंक बनाए जाएंगे। जो गंगा को और भी प्रदूषिण करेंगे। गंगा एक्शन प्लान, नमामी गंगे, स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट सिटी और अम्रूत सिटी योजना में साफ सफाई और शौचालयों पर तो ध्यान है, लेकिन शौचालयों से निकलने वाले मलमूत्र के निस्तारण की कोई योजना नहीं है।
गंगा बेसिन में प्रतिदिन 73,010 लाख लीटर सीवर का पानी मिलता है, जबकि मात्र 21,250 लाख पानी की सफाई होती है। यहां शौचालय बनना और भी खतरनाक है। शौचालयों की बढ़ती संख्या गंगा बेसिन को और गंदा करते जा रही है। जबकि, सरकार का इस ओर ध्यान ही नहीं है। गंगा बेसिन में स्वच्छ भारत मिशन में 300 लाख सेप्टिक टैंक बनना है, इससे 1800 लाख एमएलडी मानव मल गंगा में बहाया जाएगा।
सरकार का मानना है कि गंगा बेसिन में ज्यादा शौचालय बनाने से गंगा साफ होगी, जबकि, ठीक इसके उल्टा है। गंगा बेसिन में जितने शौचालय बनेंगे, उतने ही सेप्टिक टैंक बनेंगे और इसका गंदा पानी गंगा को और भी प्रदूषित करता जाएगा।
स्वच्छ भारत मिशन में सेप्टिक टैंक बनाने का प्रावधान है, लेकिन उसकी व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है। गंगा के किनारे बसे 180 शहरों से प्रतिदिन 138 ड्रेंस से 60,000 लाख लीटर गंगा में बहाया जाता है। अटल मिशन फाॅर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफारमेशन अम्रुत योजना केवल शहरों में सीवेज और सेप्टिक टैंक बनाने पर फोकस है, लेकिन उनके मैनेजमेंट पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार मानव मल और सेप्टेज मैनेजमेंट की तुलना सेंट्रल सीवेज सिस्टम से नहीं करनी चाहिए।
सीएसई ने देश के 2,367 शहरों व गंगा के किनारे के शहरों का अध्ययन किया, जिसमें छोटे-छोटे वाटर ट्रिटमेंट मैनेजमेंट में 18,900 करोड़ रूपये का खर्च आएगा, जबकि पूरा सीवेज नेटवर्क बनाने में 1,17,400 करोड़ रूपये का खर्च आएगा।
सेंटर फाॅर साइंस एंड इनवारमेंटल के जल प्रबंधन कार्यक्रम के निदेशक डा. सुरेश रोहिल्ला कहते हैं कि समाज में एक मिथ है। खुले में शौच को एक सामाजिक बुराई माना जाता है, जबकि इसके फायदे को अनदेखा कर दिया जाता है।


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