यहां हर वर्ष लगता है आशिकों का मेला, प्रेम करने वालों के लिए प्रसिद्ध है यह स्थान

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@राम नरेश यादव

भारत एक ऐसा देश, जहां रहस्य और चमत्कार भरे पड़े हैं। यहां की कला और संस्कृति दुनिया के लिए मिसाल पैदा करती है। आज हम आपको ऐसी ही एक अजीब कहानी बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद ही आपने पहले सुना होगा।
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में एक ऐसा मंदिर है। जहां प्यार करने वाले जोड़े अपने अरमानों को पूरा करने के लिए आया करते हैं।

जहां उन्हें उम्मीद होती है कि यहां से तो हम निराश नहीं लौटेंगे। यह समाज यह संस्कार यह सभ्यताएं हमें एक नहीं होने दे रही लेकिन मंदिर में विराजमान प्रभु हमें ऐसा आशीर्वाद देंगे कि हम दो से एक हो सकेंगे। यह है। नट बलि का मंदिर। जहां हर बरस लगता है ‘आशिकों का मेला।’

जब उत्तर भारत में हाड़ कंपा देने वाली ठंडी पड़ती है। उसी जनवरी के महीने की 14 तारीख को मकर संक्रांति के मौके पर यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
इस दिन हजारों की संख्या में शादीशुदा जोड़े और प्रेम करने वाले आशिक यहां आकर मन्नत मांगते हैं।


बात जब प्रेम करने वालों की हो रही है तो इस स्थान की कहानी जाननी बहुत जरूरी है।

कहानीं 600 साल पहले से शुरू होती है। जब महोबा जि‍ले के सुगिरा के रहने वाले अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग के किलेदार थे। यहां से महज कुछ दूर मध्य प्रदेश के सरबई गांव के एक नट जाति का 21 साल का लड़का बीरन किले में नौकर था।

किलेदार की खूबसूरत बेटी को बीरन से प्यार हो गया और वह अपने पिता से शादी की जिद करने लगी।

इस पर किलेदार पिता ने अपनी ही बेटी के सामने एक शर्त रख दी। शर्त यह थी कि अगर बीरन नदी के उस पार बांबेश्वर पर्वत से किले तक सूत यानिकि कच्चा धागे की रस्सी पर चढ़कर नदी पार करेगा, तभी मैं उससे तुम्हारी शादी करवाऊंगा।
प्यार में पागल बीरन ने ये शर्त स्वीकार कर ली और खास मकर संक्रांति के दिन सूत पर चढ़कर किले तक जाने लगा।

उसने नदी तो पार कर ली, लेकिन जैसे ही भूरागढ़ दुर्ग के पास पहुंचा तो अर्जुन सिंह ने किले की दीवार से बंधे सूत को काट दिया। धोके का शिकार बीरन सीधे एक विशालकाय  चट्टान पर जा गिरा और उसकी मौत हो गई।

किलेदार की बेटी ने जब अपने प्रेमी की मौत अपनी आंखों से देखी, तो वो भी किले से कूद कर उसी चट्टान पर जा गिरी और अपने प्रेमी के शव के पास आखरी सांस ली। बेटी की मौत से दुखी किलेदार पिता ने दोनों की वहीं समाधि बनवा दीं जो बाद में मंदिर में तबदील हो गईं।

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