झाँसी में विकास नहीं जाति को आधार बना रही बसपा, कुशवाहा वोट साधने में जुटे सीताराम, वरीयता नहीं मिलने से दलित वोटर नाराज!

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सीताराम कुशवाहा इससे पहले चुनाव हार चुके हैं

झाँसी : दलित वोट बैंक हमेशा ही बसपा के लिए स्थाई रहा है, लेकिन झाँसी की सदर सीट पर समीकरण कुछ अलग हैं. सपा की दीपमाला कुशवाहा का जब गठबंधन के बाद सदर सीट से टिकट कटा तो कहा जाने लगा कि कुशवाहा अब लामबंद होंगे और कुशवाहा वोट की सपा से नाराजगी का फायदा बसपा के सीताराम कुशवाहा को मिलेगा. ऐसे ही समीकरण को फिट बैठाने के लिए बसपा के सीताराम कुशवाहा ने भी कोशिश शुरू कर दी. बताया जा रहा है कि कुशवाहा समाज को पूरी तरह से अपने पाले में करने के लिए सीताराम बसपा के पारंपरिक दलित वोट को जाने-अनजाने में कम भाव दे रहे हैं. मीटिंगों में कुशवाहा समाज के लोगों की धमक दलितों से अधिक है. अन्दर खाने की खबर है कि इससे दलितों और कई पदाधिकारियों में नाराजगी भी है.

झांसी सदर विधानसभा सीट से BSP घोषित प्रत्याशी सीताराम कुशवाहा ने चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरणों का सहारा लेना शुरू कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों को एक तरफ कर दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि कोई भी प्रत्याशी जाति और धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगेगा. बसपा कैंडिडेट सीताराम कुशवाहा के समर्थन में उनकी कुशवाहा बिरादरी खुलकर आ गई है. बैठकों में यह तक कहा जाने लगा है कि इस चुनाव में सिर्फ कुशवाहा समाज का स्वाभिमान दांव पर लगा है. खुद सीताराम कुशवाहा कुशवाहा वोटों को गोलबंद करने को जुटे हैं.बताया जा रहा है कि बसपा प्रत्याशी की गुप्त बैठकों में कुशवाहा समाज के लोग ही दिखते हैं. एक जाति विशेष के लोगों का दखल बढ़ने से पारंपरिक वोट व दलित खीजे हुए हैं, जबकि दलित वोट भी झाँसी में अच्छी संख्या में है.

इसलिए हो रहा है ऐसा : दरअसल, झांसी विधानसभा सीट पर बसपा कैंडिडेट सीताराम को लगातार हार मिलती आयी है. इस बार उन्होंने अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करते हुए पूरा फोकस पहले अपनी ही जाति के लोगों को के वोट को भुनाने में कर दिया है. सपा से दीपमाला का टिकट काटने के बाद वह अधिक उत्साहित हैं. उन्हें लगता है कि पहले वोट कट जाता, लेकिन अब वह अकेले कुशवाहा प्रत्याशी हैं. ऐसे में दीपमाला के टिकट काटे जाने से नाराज कुशवाहा वोट सिर्फ उन्हें ही मिलेगा. बताते हैं कि बसपा प्रत्याशी सोचते हैं कि बसपा का परंपरागत वोट और उनकी बिरादरी के वोटों को एकजुट कर दिया जाए तो वह झांसी में जिताऊ समीकरण बना सकते हैं. इसी रणनीति पर अमल कर वह इस चुनाव में कुशवाहा स्वाभिमान को हवा दे रहे हैं. कुशवाहा समाज के लोग अलग-अलग टुकड़ियां बनाकर समाज को एकजुट करने में लगे हैं. बैठकें की जा रही हैं. झाँसी सदर सीट पर चुनाव जीतने के लिए बिरादरीबाद इस कदर हावी है कि विकास का मुद्दा और दलित बसपा के एजेंडे से पीछे छूटते नज़र आ रहे हैं.

चुनाव को कुशवाहा सम्मान से क्यों जोड़ रहे हैं सीताराम : झांसी सदर सीट से बसपा कैंडिडेट सीताराम को डर है कि BJP में शामिल कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं से प्रभावित होकर उनकी कुशवाहा बिरादरी के वोटों में सेंध न लग जाये. भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर, बसपा छोड़कर शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य और झांसी के ही कुशवाहा समाज के नेता हरगोविंद कुशवाहा अब भाजपा के साथ हैं. दीपमाला कुशवाहा तो सपा में हैं ही. सीताराम को डर है कि उनका कुशवाहा वोट ही यदि बिखर गया तो वह ये लड़ाई फिर हार जायेंगे. इसलिए वह जाति को स्वाभिमान से जोड़कर लोगों को एकजुट कर रहे हैं.

दलित भी नहीं हैं कम, ये है जातीय समीकरण : झाँसी सदर सीट पर 3, 96, 911 कुल मतदाता हैं. इनमें से पुरुष 2, 14, 159 व महिला वोट 1, 82, 732 है. इनमें से 72 हज़ार, 536 ब्राह्मण, 60 हज़ार 446 कोरी, करीब 60 हज़ार मुस्लिम, 60 हज़ार अहिरवार (दलित) व 40 हज़ार साहू वोट हैं. ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित, कोरी, साहू वोट निर्णायक भूमिका में होता है.

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