blog-शहर का भारत महाशक्ति, गाँवों का भारत भिखारी बन रहा है…

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आपके लिए कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि किसानों के इस देश में किसान भीख मांगता होगा. दो जून की रोटी जुटाने के लिए कई बार खून बेच चुका होगा. हैरानी मुझे भी हुई. पहले यकीन नहीं किया, लेकिन जब शहर से दूर कदम इन किसानों की देहरी तक पहुंचे तो हकीकत रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. गंदे काले चीथड़ों के साथ अपने बदन को ढके, मना करने के बाद भी हाथ जोड़े खड़े किसानों के इस भयावह हाल को देख खुद को ही घटिया महसूस कर रहे हैं.

आज मैं अपने साथियों के साथ बुंदलेखंड के झाँसी इलाके के मऊरानीपुर के गाँव बडागांव में हूँ. मैं हैरत में हूँ यह देख कर कि गाँव में जैसे भगदड़ सी मची है. कोई राशन कार्ड लेकर हमारी ओर दौड़ रहा है, कोई किसान वही, तो कोई जॉब कार्ड लेकर. हर कोई अपना दर्द, अपनी समस्या के बारे में बता देना चाहता है. किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार ने बताया कि आज गाँव में पहली बार कोई इन किसानों की समस्याओं को सुनने आया है. 70 साल के मूलचंद जो कभी कुछ बीघा ज़मीन के काश्तकार हुआ करते थे, अब भीख मांगते हैं. वह कहते हैं कि ‘आप भले ही नेता या अधिकारी नहीं हैं, लेकिन हमारे लिए भगवान् हैं. कम से कम हमारी चौखट पर हमें देखने आये हैं.’ छाती पीटकर उनका रोना देख कोई भी समझ सकता है कि सरकार और व्यवस्था से लोग क्यों और कैसे गुस्सा जाते हैं. ज्यादा बहस और शोध की जरूरत नहीं है. बस एक बार इस गाँव में आइये. आपको समझ आ जायेगा कि देश का विकास किसे और किस हिस्से को फायदा पहुंचा रहा है.

विकास के दावों से बेहद बुंदलेखंड के हालात बदतर होते जा रहे हैं. लगातार मौसम की मार और सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के कारण जो हालात पनपे हैं, वह झकझोर देने वाले हैं. किसान उन योजनाओं का शिकार हो गये हैं, जो उनके बेहतरी के लिए थी.

मैं अपनी टीम के साथ इस गाँव सुबह साढ़े सात बजे पहुँच गया. यहाँ जाने से पहले मैंने जब किसान नेता शिवनारायण से सुबह देर से आने की बात की थी तो उन्होंने साफ़ बतलाया कि देरी से आयेंगे तो गाँव में कोई नहीं मिलेगा. मुझे लगा काम पर जाते होंगे, लेकिन शिवनारायण ने फ़ोन पर बताया कि अधिकतर बुजुर्ग किसान भीख मांगने निकल जाते हैं.

मऊरानीपुर के इस गाँव बडागांव की आबादी लगभग 4000 है. गाँव छोटे छोटे मजरों में बंटा है. जगनपुर इन्हीं में से एक है. यहाँ दो दर्जन से अधिक किसान परिवार हैं, जो भीख मांग कर दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटा रहे हैं. इन्हें यहाँ जगवा जाति का कहा जाता है. गाँव के रहने वाले मूलचंद की उम्र 70 साल है. कमर झुक चुकी है. बोलने-चलने में पूरा शरीर काँपता है. कभी खेती-किसानी करने वाले मूलचंद को अब भीख मांगनी पड़ रही है. इसके लिए वह पास के ही कसबे में जाते हैं. मूलचंद बताते हैं कि भीख मांगने के लिए पत्नी भी अक्सर साथ जाती है. कंपकंपाते हुए बताते हैं कि उनकी कुछ ज़मीन थी, जो सिजार बाँध में चली गयी. पहले इसी से गुजर बसर होता था. अब उनके पास कुछ नहीं.

वह बताते हैं कि वह सुबह निकल जाते हैं. दिन भर बाज़ार और घरों में भीख मांगते हैं. कभी 20 तो कभी 50 रुपये जुटा लेते हैं. दिन भर में एक-दो किलो आटा भी हो जाता है. कभी सब्जी खरीद कर नहीं पाते. चटनी से ही रोटी खाते हैं. वृधावस्था पेंशन, राशन कार्ड का लाभ नहीं मिला. वह पढ़े लिखे और जागरूक भी नहीं, फिर भी उन्हें इस बात का ज्ञान है कि उनके हिस्से का पैसा और राशन 200 बीघा ज़मीन रखने वाले खा जाते हैं. सरकार ने उन पर एक बड़ी मेहरबानी की है. उसके घर के बाहर एक शौचालय बना दिया. स्वच्छ भारत यहाँ तक पहुँच गया. जो किसान भूखे मरने की नौबत पर हैं, उन्हें भले ही आजतक कुछ न मिल पाया हो, लेकिन शौचालय मिल गया. किसान की पत्नी विद्या देवी कहती हैं कि सरकार खाने को नहीं देती, लेकिन लेट्रिन (शौचालय) बना गयी.

गेंदाबाई और उसका पति श्याम लाल का पट्टा था, लेकिन भूमि अधिग्रहण में चला. उन्हें भी वाजिब मुआवजा नहीं मिला. अब दोनों भीख मांग कर खाते हैं. कुसुमा के साथ भी यही हुआ. किसान गुमटा-राजने की 10 बीघा ज़मीन बाँध के इलाके में चली गयी. मुआवजा कुछ हज़ार रुपये मिला. घर में 4 बेटियां, दो बेटे हैं. इनका पेट भरने के लिए दोनों भीख मांगते हैं. गेंदा बाई कहती हैं कि मुआवज़े के नाम पर उनके साथ छल हुआ. कुछ न कुछ उगा ही लेते थे. मुआवजा देर से मिला. तब तक ज़मीन महँगी हो गयी. मुआवज़े के मिले रूपए क़र्ज़ और ब्याज चुकाने में ही चले गये.

पूरे गाँव में एक दो पक्की छत दिखी. कुछ पर खपरैल पड़ी हैं, लेकिन दीवारें पक्की हैं. पक्की दीवारों पर खपरैल. मन में सवाल उठा. पूरा सवाल करने से पहले ही प्यारी बाई इसकी वजह बताने लगती हैं. प्यारी बाई को कुछ साल पहले एक आवास योजना का लाभ मिला. कमरे के लिए दीवारें बनायी गयी, लेकिन ठेकेदार ने छत नहीं डाली. पैसा हड़प लिया. उसने किसी तरह खपरैल डालकर छत बना ली. प्यारी बाई की स्थिति भी भीख मांगने जैसी है. गाँव में ऐसे 20 से अधिक किसान हैं, जो भीख मांग रहे हैं. ये लोग बताते हैं कि कोटेदार उनके हिस्से का राशन हड़प कर बेच देता है. शिकायत करने पर उन्हें धमकी मिलती है. डीएम, कलक्टर क्या होता ये नहीं जानते.

गाँव के किसान जलपा कुशवाहा के पास 50 बीघा ज़मीन के काश्तकार थे. इसमें काफी भूमि असिंचित थी. किसान की यह ज़मीन अधिग्रहित कर ली गयी, लेकिन मुआवजा नाम मात्र को दिया गया. जालपा बताते हैं कि वह परिवार चलाने के लिए खून बेच चुके हैं. मंशाराम के बेटे की तबियत खराब थी. मेडिकल कॉलेज में उसके इलाज के लिए 2000 रुपये में उन्होंने एक ब्लड बैंक में जाकर खून बेचा, जबकि मेडिकल कॉलेज में इलाज फ्री होता है. गाँव के लाखन सिंह भी अपना खून बेंच चुके हैं.

मुआवज़े के लिए आन्दोलन कर रहे भारतीय किसान यूनियन (भानु) किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार बताते हैं कि किसान भुखमरी की कगार पर हैं. मुआवजा देने के नाम पर उनके साथ धोखा किया गया. उनके नेतृत्व में कई बार आन्दोलन किया जा चुका है. वह बताते हैं कि मऊरानीपुर एसडीएम अमित कुमार ने इस मामले के रूचि लेते हुए लेखपाल का तबादला किया. लेखपाल आज भी इसी इलाके में नौकरी कर रहा है, जबकि एसडीएम् अमित कुमार का तबादला हो चुका है. वह बताते हैं कि डैम का कभी फायदा नहीं मिला. यह डैम भ्रष्टाचार और पैसा खाने के लिए ही बनाया गया, ऐसा प्रतीत होता है.

किसानों को घर से बेघर करने की कहानी जिस डैम से शुरू हुई, अभी उसका ज़िक्र बाकी है. मैं डैम के रूप में उस विकास को जरुर देखना चाह रहा था, जिसे कराकर सरकार ने अपनी उपलब्धियों में शामिल कर लिया. और पलट कर वापस भी नहीं देखा. मैं अपनी टीम के साथ डैम पर पहुँच गया. गाँव से 2 किलोमीटर पर स्थित बडागांव में सिजार डैम बनाए जाने के लिए 1 हज़ार 94.66 लाख रुपये की लागत निर्धारित हुई थी. इस डैम को बनाए जाने के लिए 1500 बीघा ज़मीन अधिग्रहित की गयी. बडागांव, रौनी, सिंगरवारा, चुरारा, पंचमपुरा, हरपुरा सहित 6 गाँवों के 2 से हज़ार से अधिक किसानों का जीवन प्रभावित हुआ. इनमें 95 पूरी तरह से भूमिहीन हो गये. ये सभी छोटे किसान थे, जिनके पास सिर्फ 2 से 3 बीघा ज़मीन थी. दो बीघा असिंचित भूमि के 36 तथा सिंचित भूमि वाले किसानों को 48 हज़ार रुपये मिलना तय थे. किसान बताते हैं कि तीन किश्तों में मुआवजा दिए जाने की बात कही गयी. कई सीमान्त किसानों को पहली किश्त कुछ हज़ार रुपये के रूप में मिली. इसके बाद कुछ नहीं मिला.

किसानों ने बताया कि यहाँ के अधिकारियों ने किसानों से कहा कि अगर वह एक साथ ज्यादा पैसा देख लेंगे तो उन्हें हार्ट अटैक आ जायेगा. जब किसानों ने मुझे ये बताया तो मेरे दिमाग में कई ऐसे लोगों की तस्वीरें आयीं, जो गरीब से अमीर बन गये. कई ऐसे उद्योगपति और नेता अरबपति हैं, जो पढ़े लिखे भी नहीं हैं. आये दिन किसी न किसी अधिकारी, कर्मचारी के करोड़ पति होने का खुलासा होता है. वह जब इतना पैसा देखते हैं तो उन्हें हार्ट अटैक क्यों नहीं आता.

एक हैरानी अभी और बाकी है. किसानों की ज़मीन ले ली गयी. बजट खर्च कर दिया गया. किसान भीख मांगने लगे. खून बेचने लगे. सब जतन हो गये. इसके बाद भी विकास के प्रतीक इस बाँध का गेट आज तक खुल ही नहीं पाया. यहाँ मौजूद किसान अनंत राम ने बताया कि बाँध में अब तक पानी ही नहीं आया. डैम में पानी के लिए एक दो छोटे छोटे नाले हैं, जो कभी खुद ही नहीं भरते. ऐसे में डैम कैसे भरेगा. वह बताते हैं कि किसानों को मुआवजा 1999 की दर पर अधिग्रहण के काफी बाद मिला. तब तक दूसरी जगहों की ज़मीन की कीमत बढ़ गयी. इससे वह दूसरी ज़मीन भी नहीं खरीद सके. उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा कि शायद ही कभी इस डैम का फायदा किसानों को मिले.

विकास की हकीकत का स्याह रंग देखने के बीच किसान नेता शिवनारायण व मनोज हमारे साथ थे. मनोज दिल्ली में वेब डिज़ाइनर रह चुके हैं. उनके बारे में जानने की उत्सुकता हुई. मनोज ने बताया कि दिल्ली से अपनी नौकरी छोड़ किसानों की लड़ाई के लिए अपने गाँव लौटे हैं. वेब डिजाइनर मनोज कुमार ने बताया कि पिछले 10 महीने में वह कई बार आन्दोलन कर चुके हैं. बदले में सिर्फ आश्वासन मिल रहे हैं. मनोज कहते हैं कि वह तभी शहर जायेंगे, जब तक गरीबों को न्याय नहीं मिल जाता. मनोज ने बीएड भी किया है. पिताजी पुलिस में हैं. घर वाले नाराज़ हैं कि नौकरी छोड़ वह गाँव में है. मनोज कोई नेता नहीं है और न ही अधिकारी. मनोज को अब तक सफलता भी नहीं मिली है, लेकिन किसानों के लिए वह देवता हैं. मनोज का साथ खड़े रहना ही गाँव के लोगों के लिए काफी है. किसान उनकी तारीफ करते नहीं थकते. राहुल गांधी इनके हीरो नहीं हैं, जो कई बार बुंदेलखंड आकर चले गये. राहुल ने एक खेत में फावड़ा चलाया था, इसके बाद भी किसान उन्हें नहीं मानते. कांग्रेस सरकार के बुंदेलखंड पैकेज को किसान भ्रष्टाचार का पैकेट बताते हैं. पीएम नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया को भी लोग नहीं जानते. किसान झाँसी से सांसद केंद्रीय मंत्री, धरती पुत्र मुलायम और बसपा की मायावती को भी नहीं मानते. उनके असली हीरो तो मनोज और शिवनारायण हैं, जो बिना वोट के लालच के हर समय उनके साथ खड़े हैं.

 

पांच घंटे बिताने के बाद लगातार तरक्की कर रहे विकासशील देश के इस बदनसीब गाँव से वापस चल दिए. लौटते समय अपने साथी फोटो जर्नलिस्ट राम नरेश व एक अन्य साथी से बिलकुल बातचीत नहीं की. बेतरतीब विकास और अपनी भगदड़ में लगे शहर तक यही सोचता आया कि शहर स्मार्ट सिटी और भारत महाशक्ति बन रहा है. और गाँवों का भारत भिखारी. वाकई भारत विविधताओं का देश है.

– इस लेख के लेखक जीशान अख्तर जनसरोकारी पत्रकारिता के पक्षधर हैं. दैनिक भास्कर से जुड़े हैं. ब्लॉग भी लिखते हैं. ‘आज़ाद ऐलान’ नाम से उनका ब्लॉग है.

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