बुन्देलखण्ड की यह आदिवासी बेटी अंग्रेजी सीखने जाएगी लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी

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भोपाल। बुन्देलखण्ड की यह आदिवासी बेटी अब अंग्रेजी में करेगी बात। अंग्रेजी भी ऐसी कि बड़े बड़ों को भी सामना करने में होगी मुश्किल। ऐसा इसलिए क्योंकि इस आदिवासी गरीब लड़की को अंग्रेजी सीखने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में से एक लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भेजा जा रहा है। पन्ना जिले की इस आदिवासी लड़की आशा को यह मौका मिलने के बाद इस क्षेत्र की बेटियों में भी नई आशा जगी है।
पन्ना की आशा का ऐसे हुआ सिलेक्शन
बुन्देलखण्ड के पन्ना जिले के जनबार गांव में रहने वाली आशा आदिवासी को लंदन भेजे जाने की खबर मिली तो उसकी खुशी थामे नहीं थम रही। वह लंदन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की पढ़ाई करेगी। आशा के माता-पिता मजदूरी कर बड़ी मुश्किल से अपने घर का गुजारा कर पाते हैं। उनके पास तो इतने भी पैसे नहीं है कि बेटी को किसी अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। लेकिन आशा ने हार नहीं मानी और अपनी कोशिशें जारी रखीं।
समर कैंप में स्केटिंग सीखने से हुई थी शुरुआत
गर्मी की छुट्टियों में एक सामाजिक संस्था ने गांव में समर कैंप लगाया था। इस कैंप में बच्चों को स्केटिंग सिखाई जाती थी। इस दौरान आशा ने रुचि दिखाई और अंग्रेजी सीखने की भी इच्छा जाहिर की। संस्था ने उसे अंग्रेजी की क्लास में प्रवेश दिलवा दिया, जहां अन्य बच्चे भी अंग्रेजी सीखने आते थे। कैंप में आशा ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया था। उसकी लगन को देखते हुए संस्था के लोगों ने उसे आगे भी अंग्रेजी सीखते रहने के लिए प्रेरित किया।
परखने के लिए आशा को बुलाया था मिलने
इस दौरान गांव में एनजीओ चलाने वाली जर्मन मूल की विदेशी महिला ओलेक को आशा की प्रतिभा के बारे पता चला। ओलेक ने आशा को मिलने बुलाया और उसकी प्रतिभा को परखा। उसी वक्त ओलेक ने उसे अंग्रेजी सीखने के लिए लंदन भेजने का निर्णय लिया और आशा से इस बारे में चर्चा की।
माता-पिता बेटी को विदेश भेजने को हुए तैयार
आशा के माता-पिता पहले नहीं चाहते थे कि वह अंग्रेजी सीखने के लिए विदेश जाए। एनजीओ के अधिकारी उनसे मिलने घर पहुंचे और उन्हें आशा को विदेश भेजने के लिए राजी किया।
अंग्रेजी सीखकर आने के बाद गांव के बच्चों को भी सिखाएगी
आशा की मां कहती हैं कि, मैं इस बात से खुश हूं कि मेरी बेटे अंग्रेजी सीखने विदेश जा रही है। वहां से लौटकर वह गांव ने अन्य बच्चों को भी अंग्रेजी सिखाएगी, जिससे गांव के शिक्षा के स्तर में थोड़ा सुधार होगा। वहीं, आशा के पिता का कहना है कि, बेटी को कभी अपनी आंखों से दूर नहीं किया इसलिए मन में थोड़ा डर बना हुआ है। लेकिन, उसके और गांव के अन्य बच्चों के भविष्य के चलते मैं उसे जाने से नहीं रोकूंगा।
गांव वालों ने चंदा कर जमा किए आशा को विदेश भेजने के लिए पैसे
आशा के पिता के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वे बेटी को विदेश भेज सके। परिवार की स्थिति जानने के बाद अन्य ग्रामीण आशा की मदद के लिए आगे आए। ग्रामीणों ने मिलकर आशा के लिए चंदा कर उसे विदेश भेजने के लिए पैसों का इंतजाम किया। ग्रामीणों के सहयोग से खुश आशा ने सभी को भरोसा दिलाया है कि वह विदेश से अंग्रेजी सीख कर आएगी और गांव ने अन्य बच्चों को अंग्रेजी पढऩा और बोलना सिखाएगी।
एक महीने लंदन में रहेगी आशा
चूल्हे पर खाना बनाने और गांव के छोटे से घर में रहने वाली आशा एक महीने तक लंदन में रहेगी। एनजीओ की ओर से आशा ने वीजा के लिए अप्लाई कर दिया है। आशा की इस विदेश यात्रा को ग्रामीण एक उदाहरण के तौर पर ले रहे हैं और अन्य बच्चों को भी अंग्रेजी सीखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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